Friday, September 17, 2010

ये अंधा कानून hai


पिंकी उपाध्याय
क्या कानून रामकुमार के पांच साल वापस करेगा
सेंशन कोर्ट सिवनी द्वारा आजीवन कारावास में ग्यारह साल सजा काटने के बाद उच्च न्यायालय द्वारा रामकुमार को छ: वर्ष की सजा सुनाई गई
सिवनी। यह ना कहानी है ना ही किसी फिल्म की पटकथा है यह वाकया रामकुमार परते निवासी बगलई थाना केवलारी जिला सिवनी की जिंदगी का है रामकुमार जब सोलह वर्ष का था तो उसके बड़े भाई चंदकुमार परते उम्र 21 वर्ष की रंजिश बगलई निवासी विष्णु साहू उम्र 31 वर्ष से थी इसी के चलते दिनांक 10 मई 1999 को विष्णु और चंद्रकुमार का विवाद हुआ और चंद्र कुमार द्वारा किये गये लाठी के वार से विष्णु साहू की मृत्यु हो गई घटना के समय चंद्रकुमार के साथ उसका छोटा भाई रामकुमार भी मौजूद था केवलारी पुलिस द्वारा प्रकरण बनाकर सिवनी अपर सत्र न्यायाधीश श्री आर.के.जोशी की अदालत में प्रकरण की सुनवाई हुई इस अवधि में रामकुमार एवं चंद्रकुमार सिवनी जेल में रहे दिनांक 17 मई 2001 को रामकुमार एवं चंद्रकुमार को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई । जिसके बाद दोनों भाईयों को नरसिंगपुर जेल स्थानातंरित कर दिया गया मई 2005 में हाईकोर्ट से चंद्रकुमार की जमानत मंजूर हो गई और रामकुमार जेल में अकेला रह गया। जिसे फरवरी 2008 में केन्द्रीय जेल जबलपुर भेज दिया गया । केन्द्रीय जेल जबलपुर में रामकुमार अपनी बची हुई सजा कटने का इंतजार कर रहा था उसकी सजा के 11 वर्ष 3 माह एवं माफी के 5 वर्ष कुल 16 वर्ष 3माह का कारावास वह भोग चुका था। केन्द्रीय जेल जबलपुर में ही रामकुमार की मुलाकात राजेश उपाध्याय से हुई जो आजीवन कारावास की सजा में केन्द्रीय जेल जबलपुर में बंद थे उनकी सलाह पर रामकुमार द्वारा विधिक सहायता के लिए आवेदन दिया गया एवं उन्हें अधिवक्ता श्रीमति दुर्गेश गुप्ता अपील निराकरण हेतु उपलब्ध कराई गई श्रीमति गुप्ता की दलीलो से संतुष्ट होकर न्यायाधीश श्री जी.एस.सोंलकी एवं श्री राकेश सक्सेना की बैंच द्वारा चंद्रकुमार परते एवं रामकुमार परते को छ:वर्ष की सजा सुनाई गई । जब इस मामले का निर्णय केन्द्रीय जेल जबलपुर पहुंचा तो यह पाया गया कि माफी मिलाकर रामकुमार लगभग तीन गुनी सजा काट चुका है तो उसे तत्काल केन्द्रीय जेल जबलपुर से मुक्त कर दिया गया । वर्तमान में रामकुमार अपने गृह ग्राम बगलई को छोड़ चुका है क्योंकि जहां वह निवास करता था वहां खंडहर के अलावा कुछ बाकी नही था। अत:मजदूरी कार्य कर समीपस्थ ग्राम कोहका में जीवन यापन कर रहा है। उक्त प्रकरण में न्याय में होने वाली देरी के कारण रामकुमार परते को अतिरिक्त पांच वर्ष सजा के रूप में काटने पडे क्या अब कानून रामकुमार को उसके ये पांच वर्ष वापस लौटा सकता है ?

Tuesday, August 10, 2010

सिवनी में बदस्तूर जारी है बंधुआ मजदूर प्रथा


(मामला निर्माणाधीन हाकी ग्राउंड का)
पिंकी उपाध्याय
सिवनी। यह वाकया है नगर के बीचोबीच स्थित थोक सब्जी मंडी के पिछले हिस्से की जहां पर मध्यप्रदेश में स्वीकृत तीन हाकी मैदानों में से एक का सन 2008 से निर्माण कार्य चल रहा है जहां साल भर पूर्व करोड़ो रूपये कीमत की एस्ट्रोटर्फ आकर रखी हुई है समाचार पत्रों के प्रयास से ही उसे पानी से बचाव के लिए बरसाती से ढक दिया गया है। वर्तमान में इस ग्राउंड में सीढ़ीनुमा बैठक व्यवस्था का निर्माण कार्य चल रहा है। वहां पर कार्यरत महिला श्रमिक से बात करने पर यह जानकारी मिली कि उन्हें 80 रूपये प्रतिदिन के हिसाब से मजदूरी का भुगतान किया जा रहा है इस संबंध में ठेकेदार से बात करने पर उन्होनें बताया कि ये मेरे परमानेंट मजदूर है और मेरे द्वारा निर्धारित मजदूरी से अधिक ही भुगतान किया जाता है तब पुन: एक महिला श्रमिक से पूछने पर उसने भी यही बताया कि उसे भी 80रूपये प्रतिदिन की दर से भुगतान प्राप्त होता है।
यह एक घटना है जो मध्यप्रदेश के अधिकांश क्षेत्रों की हकीकत से हमें रूबरू कराता है. अधिकांश जिलों में बंधुआ मजदूरों के बारे में हुए अध्ययन में साफ कहा गया है कि इन इलाकों में बंधुआ मजूरी बदस्तूर जारी है. इन इलाकों में दिन भर काम कराने के बाद भी मजदूरी के नाम पर 80रूपये देकर टरका दिया जाता है। जिसमे यह बात गौर करने की है कि कानूनों के दबाव व नियमों को ध्यान में रखते हुए अधिकांश क्षेत्रों में बंधुआ मजदूरों का स्वरूप बदल गया है. उल्लेखनीय है कि 1981 में मध्यप्रदेश के कमिश्नर लोहानी ने आब्रजन कानून बनाया ताकि यहां से बंधुआ बनकर जाने वाले मजदूरों को रोका जा सके जबकि उनके कारणों की खोज कर निदान करने का प्रयास नहीं किया गया।
बंधुआ मजदूरों की स्थिति
बंधक बनकर जाने वाले मजदूरों के दवा पानी राशन आदि की सुविधा कई नियोक्ता करते भी हैं तो अंत मे उनकी मजदूरी जो प्राय: अनुबंधित मजदूरी से कम होती है उसमें से काट लिया जाता है. मजदूर अनपढ़ होते हैं अत: उन्हें सही-सही पता नहीं चल पाता कि उन्हें कितना मिलना चाहिये कितना नहीं. नियोक्ता लौटते वक्त जितना देता है उतना ही लेने के लिये वे मजबूर रहते हैं. कई बार वे मुफ्त में भी काम करते हैं ।
कैसे बनते है बंधुआ मजदूर
बंधुआ मजदूर अक्सर सपरिवार ही पलायन करते हैं. गांव में केवल बूढ़े बचते हैं जो फसल से उपजे धान से अपनी जीविका चलाते हैं. ठेकेदारों के मातहत काम करने वाले मजदूर एडवांस लेकर उनके बंधुआ बनते हैं जबकि सिवनी नगर में आज भी ठेकेदारी प्रथा लागू है जो कि एडवांस देकर बधुआ बने मजदूरों पर आधारित है. आने वाले बंधुआ मजदूर जंगलों के निवासी भी हैं जो पहले अपनी आजीविका जंगलों में खोज लिया करते थे पर कम होते व कटते जंगलों से इनके आजीविका की समस्या बढ़ रही है और ये पलायित होने व बंधुआ बनने को मजबूर हो रहे हैं.इन काम करने वाले मजदूरों को ठेकेदार 1500 से 2000 रूपये मासिक देता है और 12 घंटे से ज्यादा काम करना पड़ता है.प्राय: ये अकुशल श्रमिक के रूप में देखे जाते हैं यही हालत अन्य कई क्षेत्र में काम करने वाले ठेकेदारों द्वारा बंधक मजदूरों के साथ भी है जो सड़क निर्माण से लेकर चावल मिल में काम करते हैं. अत: ठेकेदारी की बढ़ती प्रथा ने बंधुआ मजदूरों के स्वरूप को बदल दिया है. जिससे बंधुआ का जो संवैधानिक विश्लेषण है उसके तहत इन्हें पहचानना मुश्किल है.।
ये है नियम
सत्ता हस्तांतरण के 27 वर्ष बाद 19 फरवरी 1976 को बंधुआ मजदूर के शारीरिक व आर्थिक शोषण से मुक्ति हेतु Óबंधित श्रम प्रथा उन्मूलन नियम 1976Ó बनाया गया. इसके पश्चात अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति 1989 अधिनियम भी बनाया गया, जिसका सम्बंध बंधुआ मजदूरों से जुड़ा हुआ है. ऐसा इसलिए किया गया क्योकि देश में चल रही बंधुआ प्रथा में एक अंकडे के मुताबिक 98 प्रतिशत से अधिक अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लोग प्रताडि़त होते हैं.
कानूनी तौर पर बंधुआ मजदूरों को लेकर कुछ अन्य नियम भी बनाये गये जैसे बंधुआ मजदूर व प्रवासी बंधुआ मजदूर जो किसी अन्य राज्य में जाकर बंधुआ के रूप में कार्य करते हैं उनके लिये जिले में सतर्कता समिति के गठन का भी सुझाव दिया गया और समिति निर्माण का कार्य जिला अधिकारी को दिया गया. साथ में बंधुआ मजदूरी कराने वाले व्यक्ति नियोक्ता ठेकेदार आदि को दंडित करने का नियम भी बनाया गया जो 3 वर्ष तक कारावास व 2000 रूपये जुर्माने के रूप में थी. सरकार द्वारा बंधुआ मजदूरों के सम्बंध में राहत राशि की व्यवस्था भी की गयी जो 25,000 रूपये उनके पुनर्वास हेतु व पानी भूमि आदि के रूप में की गयी.जहां इसकी शिकायत की गई उनमे से कुछ को यह सुविधा प्रदान कराई गयी पर सिवनी के बंधुआ मजदूरों को यह सुविधा अभी तक नही मिली है।

Monday, August 9, 2010

जनमंच राजनैतिक पार्टी का मंच न बने





कमलनाथ की सेवाएं कहां ली जायें इसका फैसला श्रीमति सोनिया गांधी एवं डॉ.मनमोहन सिंह करेंगें जनमंच नही-हरवंश सिंह
सिवनी। म.प्र.विधानसभा उपाध्यक्ष हरवंश सिंह द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया कि विभिन्न समाचार पत्रों में आज प्रकाशित समाचार पढा,जिसमें भूतल परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ को विभाग से हटाने एवं जयराम रमेश केन्द्रीय मंत्री वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को आदेश देने की बात कही गई है। समाचार पढने से ऐसा लगता है कि फोरलेन के लिये बना सर्वदलीय जनमंच जिसे पूर्व में सिवनी जिले की सभी राजनैतिक पार्टियों और जिले की जनता एवं जिले के सभी जनप्रतिनिधियों का सहयोग मिला। इसी का परिणाम था कि 21 अगस्त 2009 को फोरलेन बनाने के नाम पर संपूर्ण जिला बंद रहा। फोरलेन पूर्व प्रस्तावित एवं स्वीकृत सिवनी से होकर ही बने इस मांग के लिये सभी एकमत है और इसके लिये समय-समय पर सभी की तरफ से प्रयास किये गये। मैने भी प्रांरभ से ही भरपूर प्रयास किये है। तथा दो बार कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल के साथ इस मांग को लेकर दिल्ली गया हॅू । संभवत: आज भी कांग्रेस पार्टी का एक प्रतिनिधिमंडल फोरलेन की मांग को लेकर दिल्ली गया है।
जनमंच में अन्य दलों के साथ-साथ कांग्र्रेस पार्टी के भी 3-4 सदस्य है संपूर्ण जनमंच की ओर से जनमंच के प्रवक्ता द्वारा आज जो प्रेस विज्ञप्ति प्रकाशित कराई गई है। वह हास्याप्रद है और फोरलेन निर्माण के आंदोलन और भावनाओं को धक्का देने वाली है। जहां एक कमलनाथ की बात है हम जब भी व्यक्तिगत या सामुहिक रूप से मिले है। उन्होनें सदैव इस फोरलेन के निर्माण कराने की बात कही है और प्रयास किये है। छिंदवाडा,दिल्ली एवं नागपुर में उन्होनें समय-समय पर स्पष्ट जोरदारी से यह बात कही है। कि उनका इरादा सिवनी को नुकसान पहुंचाने का नही है और उक्त फोरलेन सिवनी से ही बनेगी। उन्होनें अनेकों बार कहा है कि जहां तक नरसिंहपुर-छिंदवाडा-नागपुर फोरलेन की बात है वह सिवनी से होकर गुजरने वाले फोरलेन की कास्ट पर नही बनाई जा रही है उसके लिये अलग से धन और बजट की व्यवस्था की है। अभी हाल ही में खवासा से नागपुर तक के टेंडर हुये है और निर्माण कार्य भी शीघ्र प्रांरभ होगा। खवासा-नगझर-लखनादौन-नरसिंहपुर तक 75 प्रतिशत कार्य पूर्ण किया जा चुका है। पेंच पार्क मोहगांव से कुरई एवं छपारा से बंजारी क्रमश 9 एवं 10 किलोमीटर में जो रिजर्व वन क्षेत्र आता हैउसमें से एक की स्वीकृति वन मंत्रालय तथा मोहगांव -रूखड 9 किलोमीटर का प्रकरण माननीय सुप्रीम कोर्ट की उच्चाधिकार समिति के समक्ष विचाराधीन है जिसके लिये सभी तरफ से जो प्रयास होना चाहिए वो हो रहे है।
इसके साथ-साथ सबसे आवश्यक बात यह है कि तत्कालीन जिलाध्यक्ष पी.नरहरि द्वारा मध्यप्रदेश राज्य सरकार के निर्देश पर जो निर्माण कार्य पर रोक लगाइ गई है अगर वह तत्काल हटा ली जाती है तो फोरलेन निर्माण की रूकावटें 90 प्रतिशत खुद व खुद खत्म हो जायेगी। बाकी 9 किलोमीटर पेंच पार्क से लगा रिजर्व वन क्षेत्र का प्रकरण बचेगा वह माननीय सर्वोच्च न्यायालय की उच्चाधिकार समिति के निर्णय तक लंबित रहता है और अगर 9 किलोमीटर सडक वैसी की वैसी रहती है तो विशेष कोई फर्क नही पडेगा।
केन्दीय मंत्रियों के पुतले जलाने उनके खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने,विभाग बदलने जैसी बातें करने वाले लोग या मंच न तो सिवनी जिले के हित की बात कर रहे है और न ही फोरलेन निर्माण की । जनमंच में शामिल कांग्रेस के साथियों से भी मेरा आग्रह है कि जिस मंच मे ंफोरलेन निर्माण की बात कम और हमारे नेताओं को अपमानित करने की बात ज्यादा होने लगी है ऐसे मंच में उन्हें रहना चाहिये या नहीं इस पर भी उन्हें अपने विवेक का उपयोग करना चाहिये।

दुधारू पशुओ की कमी



सिवनी । विगत कुछ दिनों से जिस तरह से लगातार दुधारू पशुओं की उपयुक्त गुणवत्ताओँ में हो रही कमी एवं पशुपालन महंगा होने के कारण पशु पालकों का पशुओं से होता मोह भंग चिंतनीय ही नहीं बल्कि सोचनीय है, जिसके कारण निरंतर दूध में कमी आने के साथ ही साथ दूध की गुणवत्ता में भी प्रश्न चिन्ह लग गया है एवं इस सबका असर इतना दुर्भाग्य पूर्ण है कि आने वाले दिनों में हमारी आने वाली पीढ़ी दूध का पीना तो छोडिय़े, दूध का स्वाद भी नहीं पहचान पायेगी, जिससे शाराीरिक दुर्बलता तो बढ़ेगी, साथ ही साथ बच्चेंा का मानसिक विकास भी रूक जायेगा, इसके लिए समाज के साथ शासन को भी इस ओर जरूरी कदम उठाने आवश्यक है, जिससे इस तरह से बढ़ती हुई विसंगति एवं बिगड़ता प्राकृतिक संतुलन देश के लिए खतरनाक है।
सरकारी आंकड़ों में पशु धन
चौकिए मत 100 करोड़ से अधिक आबादी वाले देश में अब लगभग 16 करोड़ पशु बच्चे है, मरे पर सौ दूररे वाली कहावत इस पर भी पशु कल्लगाहों की संख्या बजाये घटने के बढ़ रही है। अगर आज सिन्थोटिक दूध बंद हो जाये तो दूध और सोना एक भाव बिकेगा। केन्द्र सरकार के डिपार्टमेंट आफ एनीमल हसबेंडरी के आंकड़ों पर अगर यकीन करा जाये तो 1951 में 40 करोड़ जन संख्यक पर 15 करोड़ 53 लाख, 1992 में 93 करोड़ पर 20 करोड़ 45 लाख 1977 में 19 करोड़ 47 लाख, 2003 में 18 करोड़ 51 लाख 80 हजार, 2008-09 में 16 करोड़ बचे है, जबकि 1951 में प्रति 3 लोगों पर 1 पशु था, अब 2006 में 7 लोगों पर 1 पशु रह गया है। इसके पीछे देखा जाये तो मुख्य कारण है आये दिन हजारों पशुओं की तस्करी दूसरा हर साल बड़ रहे पशु वध्रगह जरा सोचिये।
मूक जानकारों की माने तो पशु वधु ग्रह में अपंग या मरणासन पशुओं का कटान चिकित्सा अधिकारी की अनुमति से हो सकता है, जो नहीं होता ऐसा करने वाले कुछ पैसा देकर यह प्रमाण पत्र हासिल कर लेते है। कई जगह तो यह भी नहीं, डॉ. कपडिया के अनुसार पशु को स्वाभाविक मृत्यु होने पर काटा जाना चाहिये। बात सिर्फ दूध की नहंी मानव जीवन की है।
आज गोबर के अभाव में अंधाधुंध यूरिया का प्रयोग हो रहा है। जो जेव के साथ-साथ पर्यावरण व खेती के लिए अच्छा नहीं है और यह किसान को भारी भी पड़ता है। कृषि पर हो सब निर्भर है। नतीजन खाद्य पदार्थो की कीमतें आज आसमान छू रही हैं। अगर अब भी सरकारें या हम नहीं चेते तो मावा, पनीर, लस्सी, आइसक्रीम, चाय, काफी या मिठाइयां बीते दौर की बात बन जायेगी और हमारी जिंदगी बदरंग जरा सोचे कई लोगों से चर्चा करने पर उनका कहना था, सरकार पशु पालन ाको बढ़ावा दें साथ ही इस पर सबसिडी भी दी जाये, इसका प्रचार-प्रसार हो नहीं तो वह दिन दूर नहंी जब बच्चे दूध को तरस जाएंगे।
पैकेट वाले दूध पीते है बच्चे -
ग्रामीण क्षेत्रों में तो बच्चो को गाय नही तो भैंस का दूध मिल ही जाता है लेकिन शहरों में पैकेट बंद दूध ही बच्चों को पीने को मिलता है । जो सिंथेटिक दूध होता है । यह दूध गाय या भैंस का न होकर केमिकल युक्त होता है जो धडल्ले से बेचा जा रहा है । पहले के जमाने में कहा जाता था कि गांव में तो दूध की नादियां बहा करती थी लेकिन अब बच्चों को पीने के लिए स्वादिष्ट व सही दूध तक नही मिल पा रहा है । दूध की इस बढ़ती मांग को पूरी करने हेतु सिंथेटिक दूध तैयार किया जाने लगा जो कि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है । इस दूध के सेवन से बच्चे शारीरिक व मानसिक रूप से जहां कमजोर बन रहे है । वहीं वे अनेक प्रकार की बीमारियों से ग्रासित भी हो रहे है ।
आये दिन होता है पंजीबद्ध मामला गौकशी का -

शास्त्रों मे वर्णित है कि गाय की हत्या करना या उसे पीड़ा पहुंचाना जन्म दायिनी माता की हत्या करने के समान है । इसके बावजूद कत्लखानों में प्रतिदिन सैंकड़ो गायों की हत्या सिर्फ मॉस प्राप्त करने के लिए की जा रही है। कत्लखानों में बढ़ रही गायों की मांग के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्रों से इस व्यापार में लिप्त लोगों द्वारा गौवंश की खरीद फरोख्त दिन प्रतिदिन दिन दूनी रात चौगुनी की जा रही है । इन लोगों द्वारा गौ पालकों को गाय की अच्छी कीमत देकर गाय को सीधे कत्लखाना पहुंचाया जा रहा है । वहीं स्थानीय स्तर पर चोरी छिपे गाय का वधन कर मॉस विक्रय किया जाता है । एक और सरकार गौ हत्या पर प्रतिबंध लगाते हुए इस तरह के कृत्य करने वालों को अपराधी करार देती है वहीं दूसरी और कत्लखानों को संरक्षण प्रदान करती है । इससे सरकार की नियत स्पष्ट होती है । कि शासन गौवंश का अपेक्षित संरक्षण नही करना चाहता वहीं कत्ल खाने खोलकर मॉस को विदेशों में निर्यात कर धन कमाना चाहता है इस तरह शासन की दोहरी नीति से गौवंश का अस्तित्व संकट में पड़ गया है।
नही बनी योजनाएं -
कृषि प्रधान देश में तभी आर्थिक उन्नति आ सकती है जब प्रत्येक घरों में गौपालन की अनिवार्यता हो । वही गाय पालन में रूचि रखने वालों को आर्थिक सहायता प्रदान की जानी चाहिए । एवं पालन करने वाले व्यक्ति यों के आर्थिक स्तर में सुधार भी आ सकता है तथा व्यवसाय के नाम पर ऋण देने की भी योजनाएं चलाई जा रही है लेकिन वह अभी भी प्रभावी एवं सरल नही है ।

Saturday, August 7, 2010

किशोरिया कर ही सर्वाधिक प्रयोग टेंशन फ्री गोली का





सिवनी
नगर में करीब 80 मेडीकल दुकानों संचालित है तथा इस अनचाहे मातृत्व को रोकने वालीं टेंशन फ्री गोली सिपला की आई पिल और मैनकाइंड फार्मा की अनवांटेड 72। की ब्रिकी दिनों-दिन बढ़ रही है । इन गोली की ब्रिकी नगर के तीन मेडीकल दुकानों में होलसेल रेट पर उपलब्ध है जहां पर से यह पूरे सिवनी शहर में दी जाती है । इस गोली की दिन प्रतिदिन बढती मांग से किशोरियों में आये दिन नये रोंगों की बढोत्तरी हुई है । जबकि सरकार द्वारा इस गोली के विज्ञापन में बदलाव तथा रोक लगाने हेतु सरकार ने कदम उठाई है लेकिन वह कागजों में ही सीमित है नगर तथा ग्रामीण क्षेत्रों में इस का कही कोई फ्रर्क नही पडा है । तथा इसकी खुली ब्रिकी भी धडल्ले से हो रही है ।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी अनुसार अनचाहे मातृत्व को रोकने वालीं टेंशन फ्री गोली से सरकार की टेंशन बढ़ गई है। असुरक्षित यौन संबंध के बाद गर्भधारण से बचने के लिए ली जाने वाली इस आपातकालीन गोली की खुली बिक्री पर रोक लग सकती है। खास कर किशोरियों में इसके तेजी से बढ़ते दुरूपयोग को दिखते हुए औषधि महानियंत्रक कार्यालय इस पर विचार कर रहा है। ऐसी आपातकालीन गर्भरोधक गोली बनाने वाली कंपनियों को अपने विज्ञापन में बदलाव करने को भी कहा गया है। इस समय हिंदुस्तानी बाजार मे ऐसी दो गोलियां उपलब्ध है- सिपला की आई पिल और मैनकाइंड फार्मा की अनवांटेड 72। पिछले कुछ समय से दोनों ही कंपनियों में विज्ञापन की होड़ सी लग गई है। सूत्र बताते है कि औषधि महानियंत्रक ने इन दोनों दवा कंपनियों को लिखित रूप से इनके टीवी विज्ञापन पर एतराज जताया है। औषधि महानियंत्रक सुरिंदर सिंह के मुताबिक ऐसी दवाओं की खुली बिक्री की इजाजत इसलिए दी गई, ताकि आपातकालीन स्थिति में महिलाओं के पास एक विकल्प यह भी उपलब्ध हो सके। लेकिन इसके उन्मुक्त उपयोग को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता। वे कंहते है कि अब औषधि तकनीकी सलाहकार बोर्ड की बैठक में इन दवाओं पर विचार किया जाएगा। लगभग एक साल पहले इनकी खुली बिक्री की इजाजत दिए जाने से पहले भी इन्हें खरीदने के लिए डाक्टर की पर्ची जरूरी होती थी। परंतु यहां पर आये दिन इसकी बढोत्तरी हो रही है तथा यहां का औषधि विभाग के अधिकारी दो जिलो के प्रभार के कारण इस और ध्यान न देकर अपनी लापरवाहियों को उजागर कर रहे है ।
इन गोलियों के ज्यादा उपयोग करने से सरदर्द ,बुखार ,अनमना एवं अन्य बीमारी होती है।
सूत्र यह भी बताते है कि स्वास्थ्य मंत्रालय और औषधि महानियंत्रक के कार्यालय को पिछले कुछ समय से इस बारे में लगातार शिकायतें मिल रही है। इनके मुताबिक खास कर किशोरियों में ऐसा भ्रम पैदा हो रहा है कि ये दवा सामान्य गर्भनिरोधक की तरह है जिनका इस्तेमाल कर सुरक्षित यौन संबंध कायम किया जा सकता है। जबकि स्थिति इसके विपरीत है । ये दवाएं यौन संबंध के दौरान यौन रोगों से कोई सुरक्षा नहीं देती ।
इस संबंध में जब मेडीकल स्टोर्स के संचालकों से जानकारी ली गई तो उन्होनें कहा कि सबसे ज्यादा इन गोलियो की ब्रिकी सर्वाधिक होती है और यह गोली अधिकांश कम उम्र के लडके ही ले जाते है ।

Wednesday, August 4, 2010

मेरी जात हिंदुस्तानी हैं




जातिगत जनगणना पर आक्रोश
सिवनी-:जाति की जनगणना के लिये यह तर्क दिया जाता है कि अगर हम आदिवासियों, दलितो, पिछड़े वर्ग को आरक्षण का लाभ देना चाहते है तो जनगणना में जाति का हिसाब तो रखना ही होगा इसके बिना सही आरक्षण की व्यवस्था कैसे बनेगी हो सकता है कि जिन्हें आरक्षण न देना हो उन सर्वणो से उनकी जात ही न पूछी जाये लेकिन आज भी मेरे भारत देश में मेरे जैसे कुछ लोग ऐसे हैं जो कहते है कि मैं हिंदुस्तानी हँू हिंदुस्तानी के अलावा मेरी कोई जात नहीं और मैं जन्म के आधार पर दिये जाने वाले कोई आरक्षण को नहीं मानता।
ये आरक्षण की ही देन है कि जिसे जरूरत होती हैं उसे रोटी भी नहीं मिलती और जिसके पास जात होती हैं वो मलाई खाता हैं जनगणना में जाति का समावेश सर्व प्रथम १८७१ में अंग्रेजो ने देश को तोडऩे के लिये किया था किंतु उस समय भारतवासी जागरूक थे आज की तरह कायर नहीं थे उन्होनें सन १८५७ की क्रांति में इसका पुरजोर विरोध किया था क्योंकि इस समय कोई भी व्यक्ति अपने नाम के साथ अपनी जात नहीं लिखता था जैसे रानी लक्ष्मीबाई, कालीदास, कोटिल्य, वाणभट्ट, सूरदास, तुलसीदास, भवभूति, केशव, कबीर, बिहारी, भूषण सिर्फ अपना नाम ही लिखते थे जातियों की सामूहिक राजनैतिक चेतना का जहर भारत में अंग्रेजो ने ही घोला हैं किंतु उस जहर को हम आज भी क्यों पीते रहना चाहते हैं....?
मजहब के जहर ने १९४७ में भारत के टुकड़े कर दिये और भाषाओं का जहर सन १९६४-६५ में गले तक आ गया था हमारे संविधान के निर्माताओं ने आजाद भारत की पहली सरकार ने जनगणना में से जाति का जहर हटा दिया था। १९३१ में अंग्रेज सैनसस कमीश्रर जे.एच. हट्टन ने जनगणना में जाति को हटाने का विरोध इसीलिये किया था क्योंकि वे प्रसिद्ध नेतृत्व शास्त्री भी थे इसका कारण यही था कि लोग फर्जी जाति लिखाकर आरक्षण का फायदा ले लेते थे जनगणना में राजपूत अपने आप को ब्राहृण, शूद्र अपने आप को वैश्य, वैश्य अपने आप को राजपूत और कुछ शूद्र अपने आप को ब्राहृण लिखा देते थे आज भी इसके अवशेष जिंदा हैं जाति की यह शराब राष्ट्र और मजहब से ज्यादा नशीली हो सकती हैं मेरा एक ही सवाल हैं


"जिस कांग्रेस ने १९३१ में विरोध कर जनगणना से जाति को हटाया था उसी सिद्धांत को कांग्रेस ने आज क्यों सिर के बल लाकर खड़ा कर दिया"

Wednesday, July 28, 2010

तपती सड़क पर नंगे पैर बचपन























(पिंकी उपाध्याय)

यह सिवनी शहर है गर्मी के दिनों में तापमान झुलसा देने वाली गर्मी पैदा करता हैं ऐसी गर्मी में एक तो आप घर से नहीं निकलते हैं और यदि निकलते भी हैं तो इतने सुरक्षित होकर कि गर्मी का कोई थपेड़ा आपको छू न जाये लेकिन भरी दोपहरी में तपती सड़क पर नंगे पैर दौड़ता बचपन अपनी गदंगी को दूर करने की चिंता किये बगैर आपकी गाड़ी को चमका देना चाहते हैं यह देखकर दिल धक से सीना फाड़कर बाहर आने को हो जाता है।
आधुनिक युग में डामर की सड़के लगभग शहर से गायब हो गई हैं और पूरे शहर में सीमेंट की सड़के बन गई हैं गर्मी में स्थिति यह है कि अगर २० सेकेण्ड आप सड़क में खड़े हो जाओ तो आपके पैर में फोला पडऩा आम बात है किंतु ये बच्चे तो इसके आदी होते है और कोई बात की शिकायत भी नहीं करते। आज मुझे कचहरी चौक में "आभा" मिली जिसकी उम्र लगभग ६-७ साल रही होगी मैली कुचेली फटी फ्राक पहनी आभा इतनी गर्मी में अपना पसीना भी नहीं पोंछ पा रही थी क्योंकि उसकी गोद में लगभग ६ महीने का छोटा बच्चा था वो मेरे पास आई और बोली बाबूजी और हाथ फैला दिया उसे एक का सिक्का देकर मैं अपने आप को धन्य समझने लगा था घर वापस लौटते समय रिंकी और नेहा मिली इनकी हालत भी आभा से मिलती जुलती थी तब इस बात ने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि एक-दो रूपये देकर हम इन्हें भाषण और नसीहत देकर अपने आप को धन्य समझते हैं इन छोटी-छोटी नन्ही परियों के लिये राज्य शासन ने लाडली लक्ष्मी योजना बनाई हैं लेकिन फायदा कोई और उठा रहा हैं अगर सर्व शिक्षा अभियान लागू है तो क्यों ये नन्ही परियां रोड में भीख मांग रही हैं कुछ तो इनके माँ बाप भी उत्तरदायी हैं जो इन्हें भीख मांगने पर मजबूर करते हैं और कुछ हम जैसे लोगो की गल्ती है जो उन्हें देखते ही जैसे ये इंसान ही नहीं है अपना मुंह मोड़ लेते हैं प्रशासन की लापरवाही के चलते भीख मांगना इन बेटियों की आदत में शुमार हो गया हैं अगर शासन प्रशासन इन योजनाओं का सही उपयोग करता तो इन हाथों में कलम होती और ये नन्हें हाथ कभी भीख नहीं मांगते।