Saturday, August 7, 2010

किशोरिया कर ही सर्वाधिक प्रयोग टेंशन फ्री गोली का





सिवनी
नगर में करीब 80 मेडीकल दुकानों संचालित है तथा इस अनचाहे मातृत्व को रोकने वालीं टेंशन फ्री गोली सिपला की आई पिल और मैनकाइंड फार्मा की अनवांटेड 72। की ब्रिकी दिनों-दिन बढ़ रही है । इन गोली की ब्रिकी नगर के तीन मेडीकल दुकानों में होलसेल रेट पर उपलब्ध है जहां पर से यह पूरे सिवनी शहर में दी जाती है । इस गोली की दिन प्रतिदिन बढती मांग से किशोरियों में आये दिन नये रोंगों की बढोत्तरी हुई है । जबकि सरकार द्वारा इस गोली के विज्ञापन में बदलाव तथा रोक लगाने हेतु सरकार ने कदम उठाई है लेकिन वह कागजों में ही सीमित है नगर तथा ग्रामीण क्षेत्रों में इस का कही कोई फ्रर्क नही पडा है । तथा इसकी खुली ब्रिकी भी धडल्ले से हो रही है ।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी अनुसार अनचाहे मातृत्व को रोकने वालीं टेंशन फ्री गोली से सरकार की टेंशन बढ़ गई है। असुरक्षित यौन संबंध के बाद गर्भधारण से बचने के लिए ली जाने वाली इस आपातकालीन गोली की खुली बिक्री पर रोक लग सकती है। खास कर किशोरियों में इसके तेजी से बढ़ते दुरूपयोग को दिखते हुए औषधि महानियंत्रक कार्यालय इस पर विचार कर रहा है। ऐसी आपातकालीन गर्भरोधक गोली बनाने वाली कंपनियों को अपने विज्ञापन में बदलाव करने को भी कहा गया है। इस समय हिंदुस्तानी बाजार मे ऐसी दो गोलियां उपलब्ध है- सिपला की आई पिल और मैनकाइंड फार्मा की अनवांटेड 72। पिछले कुछ समय से दोनों ही कंपनियों में विज्ञापन की होड़ सी लग गई है। सूत्र बताते है कि औषधि महानियंत्रक ने इन दोनों दवा कंपनियों को लिखित रूप से इनके टीवी विज्ञापन पर एतराज जताया है। औषधि महानियंत्रक सुरिंदर सिंह के मुताबिक ऐसी दवाओं की खुली बिक्री की इजाजत इसलिए दी गई, ताकि आपातकालीन स्थिति में महिलाओं के पास एक विकल्प यह भी उपलब्ध हो सके। लेकिन इसके उन्मुक्त उपयोग को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता। वे कंहते है कि अब औषधि तकनीकी सलाहकार बोर्ड की बैठक में इन दवाओं पर विचार किया जाएगा। लगभग एक साल पहले इनकी खुली बिक्री की इजाजत दिए जाने से पहले भी इन्हें खरीदने के लिए डाक्टर की पर्ची जरूरी होती थी। परंतु यहां पर आये दिन इसकी बढोत्तरी हो रही है तथा यहां का औषधि विभाग के अधिकारी दो जिलो के प्रभार के कारण इस और ध्यान न देकर अपनी लापरवाहियों को उजागर कर रहे है ।
इन गोलियों के ज्यादा उपयोग करने से सरदर्द ,बुखार ,अनमना एवं अन्य बीमारी होती है।
सूत्र यह भी बताते है कि स्वास्थ्य मंत्रालय और औषधि महानियंत्रक के कार्यालय को पिछले कुछ समय से इस बारे में लगातार शिकायतें मिल रही है। इनके मुताबिक खास कर किशोरियों में ऐसा भ्रम पैदा हो रहा है कि ये दवा सामान्य गर्भनिरोधक की तरह है जिनका इस्तेमाल कर सुरक्षित यौन संबंध कायम किया जा सकता है। जबकि स्थिति इसके विपरीत है । ये दवाएं यौन संबंध के दौरान यौन रोगों से कोई सुरक्षा नहीं देती ।
इस संबंध में जब मेडीकल स्टोर्स के संचालकों से जानकारी ली गई तो उन्होनें कहा कि सबसे ज्यादा इन गोलियो की ब्रिकी सर्वाधिक होती है और यह गोली अधिकांश कम उम्र के लडके ही ले जाते है ।

Wednesday, August 4, 2010

मेरी जात हिंदुस्तानी हैं




जातिगत जनगणना पर आक्रोश
सिवनी-:जाति की जनगणना के लिये यह तर्क दिया जाता है कि अगर हम आदिवासियों, दलितो, पिछड़े वर्ग को आरक्षण का लाभ देना चाहते है तो जनगणना में जाति का हिसाब तो रखना ही होगा इसके बिना सही आरक्षण की व्यवस्था कैसे बनेगी हो सकता है कि जिन्हें आरक्षण न देना हो उन सर्वणो से उनकी जात ही न पूछी जाये लेकिन आज भी मेरे भारत देश में मेरे जैसे कुछ लोग ऐसे हैं जो कहते है कि मैं हिंदुस्तानी हँू हिंदुस्तानी के अलावा मेरी कोई जात नहीं और मैं जन्म के आधार पर दिये जाने वाले कोई आरक्षण को नहीं मानता।
ये आरक्षण की ही देन है कि जिसे जरूरत होती हैं उसे रोटी भी नहीं मिलती और जिसके पास जात होती हैं वो मलाई खाता हैं जनगणना में जाति का समावेश सर्व प्रथम १८७१ में अंग्रेजो ने देश को तोडऩे के लिये किया था किंतु उस समय भारतवासी जागरूक थे आज की तरह कायर नहीं थे उन्होनें सन १८५७ की क्रांति में इसका पुरजोर विरोध किया था क्योंकि इस समय कोई भी व्यक्ति अपने नाम के साथ अपनी जात नहीं लिखता था जैसे रानी लक्ष्मीबाई, कालीदास, कोटिल्य, वाणभट्ट, सूरदास, तुलसीदास, भवभूति, केशव, कबीर, बिहारी, भूषण सिर्फ अपना नाम ही लिखते थे जातियों की सामूहिक राजनैतिक चेतना का जहर भारत में अंग्रेजो ने ही घोला हैं किंतु उस जहर को हम आज भी क्यों पीते रहना चाहते हैं....?
मजहब के जहर ने १९४७ में भारत के टुकड़े कर दिये और भाषाओं का जहर सन १९६४-६५ में गले तक आ गया था हमारे संविधान के निर्माताओं ने आजाद भारत की पहली सरकार ने जनगणना में से जाति का जहर हटा दिया था। १९३१ में अंग्रेज सैनसस कमीश्रर जे.एच. हट्टन ने जनगणना में जाति को हटाने का विरोध इसीलिये किया था क्योंकि वे प्रसिद्ध नेतृत्व शास्त्री भी थे इसका कारण यही था कि लोग फर्जी जाति लिखाकर आरक्षण का फायदा ले लेते थे जनगणना में राजपूत अपने आप को ब्राहृण, शूद्र अपने आप को वैश्य, वैश्य अपने आप को राजपूत और कुछ शूद्र अपने आप को ब्राहृण लिखा देते थे आज भी इसके अवशेष जिंदा हैं जाति की यह शराब राष्ट्र और मजहब से ज्यादा नशीली हो सकती हैं मेरा एक ही सवाल हैं


"जिस कांग्रेस ने १९३१ में विरोध कर जनगणना से जाति को हटाया था उसी सिद्धांत को कांग्रेस ने आज क्यों सिर के बल लाकर खड़ा कर दिया"

Wednesday, July 28, 2010

तपती सड़क पर नंगे पैर बचपन























(पिंकी उपाध्याय)

यह सिवनी शहर है गर्मी के दिनों में तापमान झुलसा देने वाली गर्मी पैदा करता हैं ऐसी गर्मी में एक तो आप घर से नहीं निकलते हैं और यदि निकलते भी हैं तो इतने सुरक्षित होकर कि गर्मी का कोई थपेड़ा आपको छू न जाये लेकिन भरी दोपहरी में तपती सड़क पर नंगे पैर दौड़ता बचपन अपनी गदंगी को दूर करने की चिंता किये बगैर आपकी गाड़ी को चमका देना चाहते हैं यह देखकर दिल धक से सीना फाड़कर बाहर आने को हो जाता है।
आधुनिक युग में डामर की सड़के लगभग शहर से गायब हो गई हैं और पूरे शहर में सीमेंट की सड़के बन गई हैं गर्मी में स्थिति यह है कि अगर २० सेकेण्ड आप सड़क में खड़े हो जाओ तो आपके पैर में फोला पडऩा आम बात है किंतु ये बच्चे तो इसके आदी होते है और कोई बात की शिकायत भी नहीं करते। आज मुझे कचहरी चौक में "आभा" मिली जिसकी उम्र लगभग ६-७ साल रही होगी मैली कुचेली फटी फ्राक पहनी आभा इतनी गर्मी में अपना पसीना भी नहीं पोंछ पा रही थी क्योंकि उसकी गोद में लगभग ६ महीने का छोटा बच्चा था वो मेरे पास आई और बोली बाबूजी और हाथ फैला दिया उसे एक का सिक्का देकर मैं अपने आप को धन्य समझने लगा था घर वापस लौटते समय रिंकी और नेहा मिली इनकी हालत भी आभा से मिलती जुलती थी तब इस बात ने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि एक-दो रूपये देकर हम इन्हें भाषण और नसीहत देकर अपने आप को धन्य समझते हैं इन छोटी-छोटी नन्ही परियों के लिये राज्य शासन ने लाडली लक्ष्मी योजना बनाई हैं लेकिन फायदा कोई और उठा रहा हैं अगर सर्व शिक्षा अभियान लागू है तो क्यों ये नन्ही परियां रोड में भीख मांग रही हैं कुछ तो इनके माँ बाप भी उत्तरदायी हैं जो इन्हें भीख मांगने पर मजबूर करते हैं और कुछ हम जैसे लोगो की गल्ती है जो उन्हें देखते ही जैसे ये इंसान ही नहीं है अपना मुंह मोड़ लेते हैं प्रशासन की लापरवाही के चलते भीख मांगना इन बेटियों की आदत में शुमार हो गया हैं अगर शासन प्रशासन इन योजनाओं का सही उपयोग करता तो इन हाथों में कलम होती और ये नन्हें हाथ कभी भीख नहीं मांगते।

पेंच में चल रहा बाघो को बचाने के नाम पर षडयंत्र



वन विभाग प्रोजेक्ट टाईगर में पूर्णत: असफल
(पिंकी उपाध्याय)

सिवनी-:नामी बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा इन दिनों पेंच अभ्यारण में सेव टाईगर्स अभियान तमाम तरह के प्रचार माध्यमों का इस्तेमाल कर वृहद पैमाने पर चलाया जा रहा है क्या इससे बाघो की लगातार घटती संख्या में कमी आयेंगी...? शायद नहीं क्योंकि बाघों को बचाने के लिये जमीनी स्तर पर वन क्षेत्रों में इनके नाम पर हो रहे हल्ला मचाने वालो के द्वारा कोई भी सार्थक प्रयास नहीं किये जा रहे है कंपनी हो या फिर तथाकथित वाइल्ड लाईफर सभी केवल बाघ बचाने के नाम पर पैसा, नाम और शौहरत कमाने का धंधा कर रहे हैं।
प्रश्र यह उठता है कि प्रचार माध्यमों पर ऐसी कई विदेशी और देशी बहुराष्ट्रीय कंपनियां करोड़ो रूपया पानी की तरह क्यों बहा रही हैं...?
इस बात का प्रचार कर शहरी क्षेत्रों में वे किस लक्ष्य को हासिल करना चाहती हैं....?
इन सवालों के पीछे छुपे तथ्य को जानना बहुत जरूरी हैं हालांकि ऊपरी तौर पर ऐसा लगता है कि भारत ही नहीं अपितु दुनिया भर के लोग जागरूक होकर बाघो के प्रति अपनी संवेदनशीलता के साथ इनके संरक्षण में जुट जाये जबकि वन क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी, वन आश्रित समाज और गांवो के नागरिक जो जंगल और जमीन से सीधे जुड़े हैं वो पहले भी और आज भी बाघो से लगाव रखते हैं अंग्रेजो, जमीदारो, राजा महाराजाओं और नवाबों ने सिर्फ बाघों को अपनी शान के लिये मारा हैं और मार कर या तो मरे बाघ पर पाव रखकर फोटो खिंचाई हैं या बाघ की खाल को अपने ड्राईंग रूम की शोभा बनाया हैं।
१९४७ में भारत के आजाद होने के बाद भी सन १९७२ तक बाघों का शिकार जारी रहा इसके बाद वन्य जीव-जंतु संरक्षण अधिनियम १९७२ बनाया गया इसके बनाने के बाद भी प्राप्त आंकड़ो के अनुसार भारत में १४११ बाघ बचे हैं।
"आज भारत में कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां व्यापार के लिये आई हैं जिन्होंने अवर सेव टाईगर्स के नाम का सहारा लेकर जंगल के पास की जमीनों को सस्ते दामो में प्राप्त कर लिया हैं इनका उद्देश्य बाघों को बचाना नहीं हैं सिर्फ उस नाम का सहारा लेकर अपने व्यापार, होटल, कारखानों के लिये सस्ते दामों में भूमि प्राप्त करना हैं" ऐसा नहीं हैं कि वन विभाग इन कंपनियों की मंशा नहीं जानता लेकिन अपने आप को जंगलो का रखवाला बताने वाला वन विभाग आज भी देश के सबसे बड़े जमीदार की भूमिका निभा रहा हैं और इसके द्वारा अंजाम दिये जा रहे अत्याचार, शोषण, उत्पीडऩ, अवैध वसूली, त्रासदी से परेशान होकर वनो एवं उसके रहने वाले वन आश्रित ग्रामवासी धीरे-धीरे वनों को छोड़कर पलायन कर रहे हैं यह इन वनवासियों के साथ अन्याय नहीं तो क्या हैं आज वनाधिकार कानून २००६ लागू हो गया हैं किंतु इसके बाद भी वन विभाग वन सुरक्षा, वन्य जीव संरक्षण एवं प्रोजेक्ट टाईगर के कार्याे में पूर्णत: असफल रहा हैं आज वृक्षारोपण के नाम पर कागजों में पेड़ लगते है वनो का क्षेत्रफल आज तक नहीं बढ़ पाया हैं वह भी तब जबकि आजादी के बाद से लेकर आज तक लोगों की खेती, निवास, व्यापार की लाखो हेक्टेयर भूमि जंगलो में समाहित कर वन भूमि में इजाफा करने का कार्य किया गया हैं वन विभाग की असफलता के परिणामत: वन्य जीवों की संख्या में कमी आई हैं प्रोजेक्ट टाईगर असफल रहा हैं।
सेव अवर टाईगर्स अभियान में लगी इन कंपनियों के मंतव्यों को देखा जाये तो वे केवल बाघो के नाम पर अपनी स्वार्थपूर्ति के लिये प्रचार-प्रसार कर रही हैं इनका बाघों के संरक्षण से कोई लेना देना नहीं हैं अगर वास्तव में बाघो को बचाने में इनकी रूचि होती तो प्रचार-प्रसार में करोड़ो रूपये खर्च करने के बजाये वे वन्य जीव संरक्षण जिसमें बाघ भी शामिल हैं उनके लिये फील्ड यानि वन क्षेत्रों में सार्थक प्रयास करके जितना रूपया टीवी, अखबार, विज्ञापन, खिलाड़ी एवं मॉडलों पर खर्च कर रहे है उतना रूपया अगर वन्य जीव संरक्षण संबंधित कार्य जिन योजनाओं के क्रियान्वयन में वन विभाग नाकाम रहा हैं ऐसे क्षेत्रों को चिन्हित करके वन प्रबंधन के कार्य करा दिये जाते या वनाधिकार कानून को सफल रूप से क्रियान्वित करने के काम में खर्च कर देते तो जंगलो के साथ-साथ बाघो का भी भला हो जाता।
पेंच अभ्यारण में प्रवेश करते ही ऐसा लगता हैं कि किसी महानगर में आ गये हो क्योंकि अभ्यारण के द्वार तक अब प्राकृतिक सौंदर्य तो बचा ही नहीं खवासा से पेंच द्वार तक पूरी जमीन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कब्जे में आ गई हैं जो जमीन के मालिक थे वही आज इन कंपनियों के नौकर हैं यह देखकर ऐसा लगता है कि ईस्ट इंडिया कंपनी सिवनी में आ गई हो।

Wednesday, July 14, 2010

बडी धूम धाम से निकली भगवान जगन्नाथ शोभायात्रा











(पिंकी उपाध्याय)
सिवनी। प्रदेश के दूसरे और नगर को पहले जगन्नाथ मंदिर की अमूल्य धरोहर का सौभाग्य सिवनी शहर को प्रदत्त है।प्रतिवर्ष आषाढ़ माह की द्वितीया को स्वामी जगन्नाथ की शोभायात्रा यहां पुरातन काल से यहां आयोजित होती आई है अपने आप में अदभुत और इच्छा, मन, फलदायिनी इस शोभायात्रा में जगन्नाथ के भात को जगत पसारे हाथ की गंूज नगर की हर साल हर गली में यहां गुंजित होती है समाज के हर छोटे वर्ग समूह के लोग और धर्मप्रेमीजन जगन्नाथ स्वामी के इस समारोह में शरीक होते हैं।
बिना सहयोग के बना मंदिर
नगर के सुभाष वार्ड स्थित जगन्नाथ स्वामी जी के मंदिर का निर्माण स्व. सेठ भोपतराव जी पवार द्वारा सन १९१४ में (विक्रम संवत १९७१) में बिना किसी के सहयोग से कराया गया था नगर में प्रचलित किवदंती के मुताबिक जगन्नाथ मंदिर के निर्माता भोपतराव को स्वप्र में जगन्नाथ जी ने दर्शन देकर इस प्रतिमा स्थापना का उनसे संकल्प लिया था भगवान जगन्नाथ के साक्षात दर्शन से प्रफुल्लित भोपतराव ने उन दिनों बिना किसी से सहयोग लिये इस मंदिर का निर्माण कराया मंदिर में प्राण प्रतिष्ठित जगन्नाथ स्वामी की मनोहारी प्रतिमा आज भी नगर और समीपवर्ती लोगों के लिये पूज्यनीय बनी हुई हैं मंदिर के कलश, साज सज्जा और उसके कंगूरे आज भी भोपतराव के भगवत प्रेम को बयां करते हैं।
जगन्नाथ पुरी से आई मूर्तियां
मंदिर के निर्माण के बाद स्थापना के लिये स्वामी जगन्नाथ भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की प्रतिमाएं उन दिनों जगन्नाथ् पुरी से ही लाई गई थी जगन्नाथ मंदिर की प्रतिमाओं की वास्तुकला को इन प्रतिमाओं में हूबहू निखारा गया है नगर के इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि सवा माह की लगातार विशेष पूजन अर्चना के बाद भगवान की इन प्रतिमाओं की यहां प्राण प्रतिष्ठा संभव हो पाई थी उनकी इसी परम्परा का निर्वाह करते हुये इस परिवार की पांचवी पीढ़ी के सुनीलराव पवार के आहृान पर आज भी लोकप्रिय बनी हुई हैं हर वर्ष इसका बड़ा खर्च भी उनके परिजन स्वयं उठाते हैं।
९७ वर्ष में पहँुची रथयात्रा
सिवनी में जज के रूप में सेवारत भोपतराव द्वारा शुरू की जगन्नाथ की रथयात्रा ९७ वर्षाे से अनवरत चली आ रही हैं भोपतराव के बाद उनके पुत्र सेठ रामराव, गोपालराव और जगन्नाथराव के बाद भगवान जगन्नाथ की सेवा का भार सुनीलराव पवार पर हैं और वे इसका निर्वहन भी पूरी क्षमता से कर रहे हैं सुनीलराव अपने परदादा के बारे में एक कहावत यह भी चरितार्थ है कि १९५४ में उनके परदादा भोपतराव की मृत्यु के वक्त मंदिर के समीप लगा नीम का दरकश वृक्ष अपने आप टूट गया और मंदिर में लगे चारों ताले अपने आप खुल गये थे।
जगत पसारे हाथ
जगन्नाथ स्वामी के प्रसाद के रूप में भक्तों को दाल भात बहुत प्रिय है यही वजह है कि आज भी महाप्रसाद के रूप में केवल भात ही बांटा जाता है प्रसाद को पाने के लिये हजारो लोगों की जो भीड़ उमड़ती है वह हाथ पसारे जगन्नाथ के भात को जगत पसारे हाथ की कहावत को गुंजित करते हैं।
आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को प्रतिवर्ष निकलने वाली भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा नगर के प्राचीन व एकमात्र जगदीश मंदिर से मंगलवार को भव्य रूप से निकाली गई भगवान जगन्नाथ, माता सुभद्रा और भाई बलभद्र की इस शोभायात्रा को भव्य रूप देने के लिये व्यापक तैयारियां की गई थी इस रथयात्रा को नगर के परम्परागत प्रमुख मार्गाे से भ्रमण कराते हुये बैनगंगा के पावन तट लखनवाड़ा ले जाया गया इसके पूर्व यह यात्रा चित्रगुप्त, महावीर टॉकीज, सुनारी मोहल्ला, शुक्रवारी राम मंदिर, काली चौक से बरघाट रोड होते हुये विंध्यवासिनी मंदिर से गणेश चौक और वहां से जैन मंदिर के सामने से पुन: शुक्रवारी और यहां से नेहरू रोड पहँुची दुर्गा चौक, मठ मंदिर, छिंदवाड़ा चौक होते हुये शोभायात्रा बैनगंगा तट लखनवाड़ा पहँुची यहां भगवान की श्रद्धा भाव से पूजार्चना की गई।
हुई पूजा अर्चना
शोभायात्रा निकलने के पूर्व जगदीश मंदिर में बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने रीति-रिवाज के अनुसार पूजन पाठ किया वही शाम तक यहां भजन कीर्तन और आरती की गई रैली में श्रद्धालुओं ने भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया वहीं जगह-जगह इस भव्य शोभायात्रा का नागरिकों ने स्वागत व पूजनपाठ कर प्रसाद वितरण किया।

Sunday, July 11, 2010

शिक्षण संस्थान सुविधा विहीन (पिंकी उपाध्याय)



नही मिल रही बच्चों को बेहतर शिक्षा व संस्कार
उच्चतम न्यायालय नई दिल्ली द्वारा दिये गये निर्देशों का नही हो पा रहा पालन


सिवनी । निजी स्कूल संचालक पालकों को कितनी ही सुविधायें देने का वादा सत्र प्रारंभ होने से पूर्व देते हों लेकिन स्थिति इसके विपरीत होती है। शिक्षा विभाग के स्पष्ट एवं कड़े निर्देशों के बावजूद भी निजी शिक्षण संस्थान उन शर्तों को पूरा नहीं करते। ९० प्रतिशत निजी व प्राइमरी स्कूल नियमों को लगभग ताँक में रखते हुये मान्यता हासिल कर लेते हैँ वहीं दूसरी ओर शिक्षा विभाग का भारी भरकम अमला भी इस मामले में चुप्पी साधे रखता है लगभग 50 प्रतिशत स्कूल भाड़े का मकान लेकर लगाये जाते हैं इन मकानों में ना ही कोई पर्याप्त खेल मैदान होता है और ना ही आवागमन की सुविधा। पढने वाले बच्चे खेल कूद में पूरी तरह पिछड़ जाते हैं दाखिले के समय अभिभावकों को तरह तरह के प्रलोभन देकर फँसा लिया जाता है लाइब्रेरी खेल कूद मैदान, खुला वातावरण, प्रयोग शाला, शौचालय, पीने के पानी की व्यवस्था का पूर्ण रूप से अभाव रहता है। अनेक स्कूलों में अध्यापन का समय भी निर्धारित नहीं है सप्ताह के कुछ दिन प्रात: स्कूल लगते हैं तो कभी दोपहर में जिस वजह से कई बच्चे नियमित रूप से अध्यापन कार्य नहीं कर पाते कई स्कूल सप्ताह के कुछ दिन ही खुलते हैं अभिभावकों के निवेदन के पश्चात् भी इन स्कूलों में कोई सुनवाई नहीं होती उल्टा उन्हें यह कह दिया जाता है कि अपने बच्चे का दाखिला किसी फकीर सरकारी स्कूलों में करवा दो इन सबके बावजूद भी स्कूल संचालक अभिभावकों से फीस के नाम पर मोटी रकम वसूलते हैं। इन सब मामलों में बनाई गई जाँच समिति भी ले देकर शर्तें पूरी ना कर पाने वाली शिक्षण संस्थाओं पर कोई अंकुश नहीं लगा पाती हैं।
नगर में पिछले कुछ वर्षाे में प्रायवेट स्कूलों की बाढ़ सी आ गई हैं। शहर के लगभग हर इलाके में निजी स्कूल संचालित हैं। वहीं बेहतर शिक्षा पाने के ललक व आगे दिखने की होड़ में अभिभावक अपने बच्चों को इन स्कूलों में छात्र-छात्राओं की संख्या भी बढ़ी हैंन केजी वन से लेकर हाईस्कूल तक की कक्षाओं वाले स्कूलों की संख्या इनमें अधिक हैं किंतु नगर में अनेक प्रायवेट स्कूल संचालित हैं, जो शासन द्वारा निर्धारित नियमों का खुलेआम उल्लंघन कर रहे हैं।
इन स्कूलों में छात्रों के खेलने के लिए ग्राउंड भी नहीं हैं और फीस के लालच में छोटे-छोटे कमरों में क्षमता से अधिक विद्यार्थी बिठाये जाते हैं स्कूल संचालकों द्वारा छात्र-छात्राओं के अभिभावकों से मोटी फीस वसूली जाती हैं वहीं सत्र प्रारंभ होने पर उन्हें निर्देशित किया जाता हैं कि वे उनकी बताई दुकानों से ही कापी किताबें व यूनिफार्म खरीदें। इन दुकनों से स्कूल संचालक अपना कमीशन भी वसूलते हैं इन स्कूल संचालकों द्वारा कम वेतन पर शिक्षक-शिक्षिकाएं रखते हैं जो स्कूल में विद्यार्थियों को सही तरीके से पढ़ाई नहीं करवाते और अपने पास ट्यूशन पढऩे के लिए मजबूर करते हैं इसीलिये छोटी-छोटी कक्षाओं में अध्ययनरत छात्र-छात्राएं को भी ट्यूशन जाना पड़ता हैं।
इससे अभिभावकों पर बच्चों की पढ़ाई का अतिरिक्त भार पड़ता हैं। स्कूलों में मैदान का अभाव होने से यहां खेलकूद इत्यादि भी नहीं होते इससे छात्र-छात्राएं खेलकूद की गतिविधियों से वंचित रह जाते हैं इन स्कूलों में कोई रचनात्मक कार्य व प्रतियोगिता भी आयोजित नहीं की जाती, जिससे छात्र-छात्राओं में प्रतिस्पर्धा की भावना का भी विकास नहीं होता। छात्र-छात्राएं जैसे तैसे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।
नही मिल रही बच्चों को बेहतर शिक्षा व संस्कार
उच्चतम न्यायालय नई दिल्ली द्वारा दिये गये निर्देशों का नही हो पा रहा पालन
सिवनी । निजी स्कूल संचालक पालकों को कितनी ही सुविधायें देने का वादा सत्र प्रारंभ होने से पूर्व देते हों लेकिन स्थिति इसके विपरीत होती है। शिक्षा विभाग के स्पष्ट एवं कड़े निर्देशों के बावजूद भी निजी शिक्षण संस्थान उन शर्तों को पूरा नहीं करते। ९० प्रतिशत निजी व प्राइमरी स्कूल नियमों को लगभग ताँक में रखते हुये मान्यता हासिल कर लेते हैँ वहीं दूसरी ओर शिक्षा विभाग का भारी भरकम अमला भी इस मामले में चुप्पी साधे रखता है लगभग 50 प्रतिशत स्कूल भाड़े का मकान लेकर लगाये जाते हैं इन मकानों में ना ही कोई पर्याप्त खेल मैदान होता है और ना ही आवागमन की सुविधा। पढने वाले बच्चे खेल कूद में पूरी तरह पिछड़ जाते हैं दाखिले के समय अभिभावकों को तरह तरह के प्रलोभन देकर फँसा लिया जाता है लाइब्रेरी खेल कूद मैदान, खुला वातावरण, प्रयोग शाला, शौचालय, पीने के पानी की व्यवस्था का पूर्ण रूप से अभाव रहता है। अनेक स्कूलों में अध्यापन का समय भी निर्धारित नहीं है सप्ताह के कुछ दिन प्रात: स्कूल लगते हैं तो कभी दोपहर में जिस वजह से कई बच्चे नियमित रूप से अध्यापन कार्य नहीं कर पाते कई स्कूल सप्ताह के कुछ दिन ही खुलते हैं अभिभावकों के निवेदन के पश्चात् भी इन स्कूलों में कोई सुनवाई नहीं होती उल्टा उन्हें यह कह दिया जाता है कि अपने बच्चे का दाखिला किसी फकीर सरकारी स्कूलों में करवा दो इन सबके बावजूद भी स्कूल संचालक अभिभावकों से फीस के नाम पर मोटी रकम वसूलते हैं। इन सब मामलों में बनाई गई जाँच समिति भी ले देकर शर्तें पूरी ना कर पाने वाली शिक्षण संस्थाओं पर कोई अंकुश नहीं लगा पाती हैं।
नगर में पिछले कुछ वर्षाे में प्रायवेट स्कूलों की बाढ़ सी आ गई हैं। शहर के लगभग हर इलाके में निजी स्कूल संचालित हैं। वहीं बेहतर शिक्षा पाने के ललक व आगे दिखने की होड़ में अभिभावक अपने बच्चों को इन स्कूलों में छात्र-छात्राओं की संख्या भी बढ़ी हैंन केजी वन से लेकर हाईस्कूल तक की कक्षाओं वाले स्कूलों की संख्या इनमें अधिक हैं किंतु नगर में अनेक प्रायवेट स्कूल संचालित हैं, जो शासन द्वारा निर्धारित नियमों का खुलेआम उल्लंघन कर रहे हैं।
इन स्कूलों में छात्रों के खेलने के लिए ग्राउंड भी नहीं हैं और फीस के लालच में छोटे-छोटे कमरों में क्षमता से अधिक विद्यार्थी बिठाये जाते हैं स्कूल संचालकों द्वारा छात्र-छात्राओं के अभिभावकों से मोटी फीस वसूली जाती हैं वहीं सत्र प्रारंभ होने पर उन्हें निर्देशित किया जाता हैं कि वे उनकी बताई दुकानों से ही कापी किताबें व यूनिफार्म खरीदें। इन दुकनों से स्कूल संचालक अपना कमीशन भी वसूलते हैं इन स्कूल संचालकों द्वारा कम वेतन पर शिक्षक-शिक्षिकाएं रखते हैं जो स्कूल में विद्यार्थियों को सही तरीके से पढ़ाई नहीं करवाते और अपने पास ट्यूशन पढऩे के लिए मजबूर करते हैं इसीलिये छोटी-छोटी कक्षाओं में अध्ययनरत छात्र-छात्राएं को भी ट्यूशन जाना पड़ता हैं।
इससे अभिभावकों पर बच्चों की पढ़ाई का अतिरिक्त भार पड़ता हैं। स्कूलों में मैदान का अभाव होने से यहां खेलकूद इत्यादि भी नहीं होते इससे छात्र-छात्राएं खेलकूद की गतिविधियों से वंचित रह जाते हैं इन स्कूलों में कोई रचनात्मक कार्य व प्रतियोगिता भी आयोजित नहीं की जाती, जिससे छात्र-छात्राओं में प्रतिस्पर्धा की भावना का भी विकास नहीं होता। छात्र-छात्राएं जैसे तैसे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

महानगरों के बाद अब सिवनी भी ड्रग्स की चपेट में














(पिंकी उपाध्याय)





सिवनी के युवाओं का भविष्य खतरे में

जिसने एक बार यह किया वो ही बन जाता है बिक्री एजेंट




सिवनी। नगर में इन दिनों एक कश के जुगाड़ में नवयुवक सुबह से शाम और शाम से रात तक इधर से उधर और कुछ भी करने को तैयार खड़े है कारण सिर्फ इतना है कि यह कश जो एक बार पी लेता है वह उसका आदी हो जाता है और फिर उसका एजेंट बन जाता है क्योंकि यह कश 100 से 1000 और 1000 से 10,000 तक का भी हो सकता होता है। जी हॉं यह वही नशा है जिसे महानगरों में ड्रग्स के नाम से जाना जाता है जिसमें कोकीन,हेरोइन ,ब्राउन शुगर की मात्रा होती है जिसकी मात्रा के हिसाब से पुडिय़ा की कीमत तय होती है किंतु अब यह नशा अपने पांव पसार चुका है।





माफिया की तर्ज पर फैला है कारोबार

अब सवाल यह उठता है कि शहर में ड्रग्स का विक्रय कैसे होता है शहर के कुख्यात निचले तबके के लोगों द्वारा पहले तो युवाओं को इसका आदी बनाया जाता है उसके बाद जब वह युवा इसका आदी हो जाता है तो उसे ही एजेंट के रूप में प्रयोग में लाया जाता है इसका कारोबार सिवनी से नागपुर तक आर्गनाईज क्राइम के रूप में विकसित है जिसे हमने तो समझ लिया लेकिन प्रशासन क्यों नही समझ रहा है।





ड्रग्स के सबंध में पुलिस प्रशासन के मुख से
इस संबंध में सिवनी थाना कोतवाली मे जानकारी देने पर थाने में उपस्थित एएसआई एम.पी.तिवारी द्वारा बताया गया कि सर्वप्रथम पुडिय़ा को जांच हेतु भेजा जायेगा अगर उसमें कोई नशीले पदार्थ की पुष्टि होगी तभी प्रक्रिया आगे बढ पायेगी। क्योंकि एनडीपीएस एक्ट के तहत आरोपी को आजीवन कारावास तक का प्रावधान है एवं प्रकरण की पुष्टि न होने पर हमें खामियाजा भुगतना पड़ता है। इसी विषय पर वर्तमान कोतवाली प्रभारी सब इंस्पेक्टर विजय तिवारी से बात करने पर उन्होनें कहा कि हमें जो टे्रनिग मिली है उसके अनुसार ब्राउन शुगर सफेद दानेदार पाउडर होता है यह मटमैला पाउडर ब्राउन शुगर है कि नहीं मै नही बता सकता किंतु इस मामले में जांच कर हम आवश्यक कार्यवाही जरूर करेगें ।





सिवनी की वर्तमान स्थिति
अगर आज शहर में पुडिया पीने वालों की गणना की जाएं तो यह संख्या हजार के ऊपर होगी जिसमें नगर के संभ्रात परिवारों से लेकर एक गरीब मजदूर भी शामिल है अगर प्रशासनिक जांच की यही रफ्तार रही तो इस नशे के आदी नगर के युवाओं की संख्या कई गुना बढ जायेगी अगर जल्दी प्रशासन इस विषय में नही जागा तो हर दूसरे घर में इस नशे का आदी एक व्यक्ति होगा और यह नशा ऐसा है कि परिवार का एक सदस्य अगर इसका आदी हो तो पूरा परिवार इसकी सजा भुगतता है।